वंदे मातरम् के 150 वर्ष: राष्ट्रवाद, संस्कृति और संविधान
सोनू कुमार तिवारी उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, जब भारत औपनिवेशिक शासन के बोझ तले दबा हुआ था और राष्ट्र की कोई साझा आवाज़ नहीं थी, तब एक गीत ने जनमानस में नई चेतना जगा दी। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से निकला वंदे मातरम् केवल शब्दों का संयोजन नहीं था, बल्कि वह भावना थी जिसने […]
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