वंदे मातरम् के 150 वर्ष: राष्ट्रवाद, संस्कृति और संविधान

सोनू कुमार तिवारी

न्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, जब भारत औपनिवेशिक शासन के बोझ तले दबा हुआ था और राष्ट्र की कोई साझा आवाज़ नहीं थी, तब एक गीत ने जनमानस में नई चेतना जगा दी। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से निकला वंदे मातरम् केवल शब्दों का संयोजन नहीं था, बल्कि वह भावना थी जिसने भारत को पहली बार एक “माता” के रूप में देखने का साहस दिया। गलियों से लेकर सभाओं तक, यह गीत फुसफुसाहट से नारे में बदला और स्वतंत्रता की आकांक्षा को स्वर मिला। 150 वर्षों बाद भी, यह गीत हमें राष्ट्रवाद, संस्कृति और संविधान के बीच उस सेतु की याद दिलाता है, जिस पर चलकर आधुनिक भारत का निर्माण हुआ। भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम – का  आशय है “मां ,मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं”।वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ 7 नवंबर, 2025 को मनाई जा रही है, क्योंकि यह गीत बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा 7 नवंबर, 1875 को लिखा गया था, और भारत सरकार ने 7 नवंबर, 2025 से शुरू होकर पूरे एक साल तक (7 नवंबर, 2026 तक) देशव्यापी उत्सव मनाने की घोषणा की है, जिसमें स्मारक डाक टिकट और अन्य कार्यक्रम शामिल हैं।

वंदे मातरम् के अर्थ और महत्व को सही रूप में समझने के लिए इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को जानना आवश्यक है। यह गीत साहित्य, उभरते राष्ट्रवाद और भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को जोड़ने वाली एक सशक्त कड़ी रहा है। एक साहित्यिक रचना से राष्ट्रीय गीत बनने तक की इसकी यात्रा औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारतीय समाज की सामूहिक चेतना के विकास को दर्शाती है।

इस गीत की रचना 1875 के आसपास हुई थी। इस तथ्य का उल्लेख अरविंद घोष ने 16 अप्रैल 1907 को अंग्रेज़ी पत्र ‘बंदे मातरम्’ में प्रकाशित अपने लेख में किया है। उन्होंने बताया कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत की रचना लगभग 32 वर्ष पहले की थी। प्रारंभ में यह गीत सीमित लोगों तक ही पहुँचा, किंतु जब बंगाल में राजनीतिक और सामाजिक जागृति तेज हुई, तब यह गीत जनभावनाओं की अभिव्यक्ति बनकर उभरा।

आनंदमठ उपन्यास पुस्तक के रूप में प्रकाशित होने से पहले बंगाली मासिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में धारावाहिक रूप से छपता था, जिसके संपादक स्वयं बंकिमचंद्र थे। उपन्यास की पहली कड़ी के साथ मार्च–अप्रैल 1881 में वंदे मातरम् गीत प्रकाशित हुआ।

वर्ष 1907 में, मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट में भारत के बाहर पहली बार भारतीय ध्वज फहराया, जिस पर वंदे मातरम् अंकित था। यह घटना इस गीत के राष्ट्रवादी संदेश के अंतरराष्ट्रीय विस्तार को दर्शाती है।

वंदे मातरम् का राजनीतिक नारे के रूप में पहला व्यापक प्रयोग 7 अगस्त 1905 को देखा गया। इस दिन विभिन्न समुदायों के हज़ारों छात्रों ने कलकत्ता (कोलकाता) में टाउन हॉल की ओर जुलूस निकाला और वंदे मातरम् सहित अन्य राष्ट्रवादी नारों से वातावरण को गुंजायमान कर दिया। टाउन हॉल में आयोजित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सभा में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग से संबंधित प्रस्ताव पारित किया गया। यह सभा बंगाल विभाजन के विरोध में आरंभ हुए स्वदेशी आंदोलन का स्पष्ट संकेत थी। इसके बाद बंगाल में घटित घटनाओं ने राष्ट्रवादी भावना को तेज़ किया और यह उत्साह शीघ्र ही पूरे देश में फैल गया।

कुछ मुस्लिम धार्मिक नेताओं और समूहों ने यह आपत्ति उठाई है कि इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत करने की अनुमति है, और देश को देवी मानकर उसकी वंदना करना शिर्क (मूर्ति पूजा या बहुदेववाद) के समान है, जो उनके धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध है। उनका तर्क है कि यह गीत केवल हिन्दू धर्म की मान्यताओं को दर्शाता है।

कुछ लोग का तर्क है देशभक्ति और राष्ट्रवाद को किसी विशेष गीत के गायन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए, खासकर जब वह गीत उनकी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत हो।

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की आख़िरी बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ‘वंदे मातरम्’, जिसने आज़ादी की लड़ाई में लोगों को जोड़ने का काम किया, उसे राष्ट्रगान जैसा ही सम्मान दिया जाएगा। इसी वजह से वंदे मातरम् को भारत का राष्ट्रीय गीत माना जाता है।

लेकिन हमारे संविधान में नागरिकों के कर्तव्यों की बात करते समय केवल संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान के सम्मान का ज़िक्र है। वहाँ राष्ट्रीय गीत शब्द नहीं लिखा गया है। इसी कारण कभी-कभी यह सवाल उठता है कि वंदे मातरम् को संविधान में साफ़ तौर पर जगह क्यों नहीं मिली।

अदालतों ने भी साफ़ कहा है कि वंदे मातरम् गाना किसी के लिए ज़रूरी नहीं है। कानून में भी केवल राष्ट्रगान के लिए नियम बनाए गए हैं—जैसे उसके समय खड़ा होना और उसका अपमान करने पर सज़ा। वंदे मातरम् के लिए ऐसा कोई अलग कानूनी नियम या सज़ा तय नहीं की गई है।

वंदे मातरम् के 150 वर्ष भारत के राष्ट्रवादी इतिहास की एक लंबी और जटिल यात्रा को दर्शाते हैं। यह गीत केवल स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि उसने भारतीय समाज में सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय एकता को भी स्वर दिया। समय के साथ इससे जुड़े विवाद यह दिखाते हैं कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में राष्ट्रवाद को समझने और अपनाने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं। भारतीय संविधान और न्यायपालिका ने वंदे मातरम् को सम्मान देते हुए भी व्यक्तिगत आस्था और स्वतंत्रता की रक्षा को प्राथमिकता दी है। यही संतुलन भारतीय लोकतंत्र की मूल विशेषता है, जहाँ राष्ट्रप्रेम भावनात्मक होने के साथ-साथ संवैधानिक मर्यादा में भी बंधा रहता है।


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